इजरायल के कारण तुर्की और अजरबैजान के बीच तनाव
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मूल स्रोत:ynet.co.il
मुख्य निष्कर्ष
- तुर्की में शिखर सम्मेलन में अलीयेव की अनुपस्थिति राजनयिक तनाव को दर्शाती है।
- हिजाब पर आलोचना और इजरायल के साथ संबंध संघर्ष के मुख्य बिंदु हैं।
- एर्दोगन राजनयिक संकेतों के माध्यम से संबंधों को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं।
- रणनीतिक गठबंधन पर भारी दबाव है।
तुर्की और अजरबैजान के बीच रणनीतिक साझेदारी, जिसे अक्सर 'एक राष्ट्र, दो राज्य' के रूप में वर्णित किया जाता है, हाल के दिनों में एक कठिन दौर से गुजर रही है। जो गठबंधन कभी अटूट माना जाता था, वह अब वैचारिक मतभेदों और भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण चुनौतियों का सामना कर रहा है। इस शीतलता का सबसे स्पष्ट संकेत अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव का तुर्की में आयोजित एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन में शामिल न होना था, जिसे विश्लेषकों ने असंतोष के एक स्पष्ट राजनयिक संकेत के रूप में देखा है।
इस तनाव की जड़ें बहुआयामी हैं। हाल के महीनों में, तुर्की के सार्वजनिक विमर्श और मीडिया ने अजरबैजान की घरेलू नीतियों, विशेष रूप से स्कूलों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध की कड़ी आलोचना की है। बाकू में इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखा गया है। इसके अलावा, अजरबैजान और इजरायल के बीच घनिष्ठ संबंध अंकारा में असुविधा का कारण बने हैं। जहां तुर्की का इजरायल के प्रति रुख सख्त हो गया है, वहीं बाकू का यरुशलम के साथ निरंतर सहयोग क्षेत्रीय गठबंधन को जटिल बना रहा है।
इस स्थिति को सुधारने के प्रयास में, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने अलीयेव के साथ सीधी बातचीत की है और कथित तौर पर अपने एक उच्च-स्तरीय सहायक को बर्खास्त कर दिया है, जिसे बाकू में अजरबैजान विरोधी माना जाता था। इन कदमों का उद्देश्य तुर्की की गठबंधन के प्रति प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करना था। हालांकि, अलीयेव का स्वयं न आकर अपने विदेश मंत्री को भेजना यह दर्शाता है कि विश्वास पूरी तरह से बहाल नहीं हुआ है।
अजरबैजान के दृष्टिकोण से, यह स्थिति विशेष रूप से दर्दनाक है क्योंकि आलोचना एक ऐसे देश से आ रही है जिसे वे भाई मानते हैं। बाकू के विश्लेषकों का कहना है कि तुर्की में अजरबैजान के खिलाफ मीडिया अभियानों ने सार्वजनिक नाराजगी पैदा की है। राजनयिक मिशनों के सामने विरोध प्रदर्शनों के बाद 30 तुर्की नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय इस अविश्वास का एक ठोस प्रमाण है। शिखर सम्मेलन के दौरान, एर्दोगन ने 'तुर्की परिवार' के भीतर एकता का संदेश देने की कोशिश की, लेकिन राजनयिक वास्तविकता जटिल बनी हुई है। दोनों देशों के लिए चुनौती अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक साझेदारी की मांगों के बीच संतुलन बनाना है।
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